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पशु अधिकार

मूंगफली की खेती कैसे करें (How to Grow Peanuts)

मूंगफली की खेती कैसे करें की यह संपूर्ण मार्गदर्शिका भारतीय किसानों को जलवायु-अनुकूल तरीकों से उत्पादन बढ़ाने और पशु-कल्याण को बढ़ावा देने में मदद करेगी।

21 मिनट पढ़ें
मूंगफली की खेती करते भारतीय किसान, धूप के सुनहरे प्रकाश में फसल में हाथ लगाते
13-15%
वैश्विक उत्पादन में भारत का हिस्सा
FAO 2023 के अनुसार भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मूंगफली उत्पादक है।
1.5-3.0
औसत उत्पादकता (टन/हेक्टेयर)
ICAR 2025 के अनुसार अच्छी तकनीक से उत्पादन 3 टन तक संभव है।
15-20%
जैविक मूंगफली मूल्य लाभ
APEDA 2025 के अनुसार जैविक उत्पाद को अधिक कीमत मिलती है।
40%
कीटनाशक, जैविक उत्सर्जन कटौती
NABARD 2025 के अनुसार ड्रिप सिंचाई से पानी की बचत और उत्पादन में वृद्धि।

TL;DR: मूंगफली की खेती कैसे करें — भारतीय किसानों के लिए यह चरण-दर-चरण मार्गदर्शिका सितंबर 2026 की जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल है। मिट्टी की तैयारी, खाद, सिंचाई और रोग प्रबंधन के वैज्ञानिक तरीकों से उत्पादन बढ़ाएं और पशु-कल्याण को बढ़ावा देने वाले टिकाऊ कृषि मॉडल को अपनाएं।


मूंगफली की खेती क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है

मूंगफली की खेती एक ऐसी कृषि प्रणाली है जिसमें मिट्टी की तैयारी से लेकर भंडारण तक, हर चरण में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर फलियों का अधिकतम उत्पादन लिया जाता है; यह भारत के लिए आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सूखा-सहिष्णु, पशु-कल्याण को बढ़ावा देने वाला और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने वाला विकल्प है। यह फसल न केवल प्लांट-बेस्ड प्रोटीन का स्रोत है, बल्कि पशुपालन पर निर्भरता घटाकर एक दयालु और टिकाऊ खाद्य प्रणाली की नींव रखती है — यही KindEco के मूल उद्देश्य से मेल खाता है।

भारतीय किसानों के लिए मूंगफली की खेती सिर्फ़ एक फसल नहीं, बल्कि एक रणनीतिक अवसर है। यह फसल देश के कई राज्यों — गुजरात, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु — में मुख्य रूप से खरीफ सीजन में उगाई जाती है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव और पारंपरिक पशुपालन के पर्यावरणीय बोझ को देखते हुए, मूंगफली जैसी दलहनी फसलें किसानों के लिए एक सुरक्षित विकल्प बनकर उभरी हैं।

मूंगफली की खेती का वैश्विक और भारतीय संदर्भ

वैश्विक स्तर पर मूंगफली की खेती का क्षेत्रफल और उत्पादन में भारत की अहम भूमिका है, और हाल के वर्षों में जलवायु-अनुकूल किस्मों के विकास के साथ इसका विस्तार हुआ है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO, 2023) के अनुसार, भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मूंगफली उत्पादक देश है, जो वैश्विक उत्पादन का लगभग 13-15% हिस्सा रखता है। चीन पहले स्थान पर है, लेकिन भारत में उत्पादन का रुझान लगातार बढ़ रहा है।

भारतीय परिदृश्य में, मूंगफली पारंपरिक रूप से छोटे और सीमांत किसानों की फसल रही है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के आंकड़े बताते हैं कि देश में लगभग 4-5 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में मूंगफली की खेती होती है, पर उत्पादकता में राज्यों के बीच बड़ा अंतर है। गुजरात में उत्पादन दर सबसे ज़्यादा है, जबकि विभिन्न राज्यों में औसत 1.2 से 2.5 टन प्रति हेक्टेयर के बीच है।

इस संदर्भ में, मूंगफली की खेती को बढ़ावा देना भारत की खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। खासकर जब हम पशु-आधारित उत्पादों के उत्पादन से जुड़ी उच्च कार्बन लागत की तुलना करें, तो मूंगफली जैसे पौध-आधारित प्रोटीन स्रोतों को अपनाना न केवल स्वास्थ्य के लिए बेहतर है, बल्कि पशु-कल्याण के नज़रिए से भी ज़रूरी है।

मूंगफली की खेती की मुख्य किस्में और जलवायु आवश्यकताएँ

मूंगफली की खेती के लिए उपयुक्त किस्म का चुनाव और जलवायु की समझ उत्पादन को दोगुना कर सकती है, क्योंकि सही किस्म में रोग प्रतिरोधक क्षमता और सूखा सहनशीलता होती है। भारत में मूंगफली की खेती मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है: स्पैनिश (बंच) और वर्जीनिया (रनर)। स्पैनिश किस्में जल्दी पकती हैं (90-110 दिन) और तेल निकालने के लिए उत्तम हैं, जबकि वर्जीनिया किस्में देर से पकती हैं और मूंगफली की चटनी या नमकीन के लिए बेहतर मानी जाती हैं।

जलवायु के संदर्भ में, मूंगफली की खेती के लिए 25-30°C तापमान और 500-600 मिमी वार्षिक वर्षा वाला क्षेत्र आदर्श माना जाता है। सितंबर 2026 के परिप्रेक्ष्य में, जलवायु परिवर्तन के कारण बदलते मौसम पैटर्न ने खरीफ सीजन में बुवाई के समय को प्रभावित किया है। इसलिए, किसानों को अपने क्षेत्र के अपडेटेड मौसम पूर्वानुमान पर नज़र रखनी चाहिए और ICAR द्वारा अनुशंसित जलवायु-लचीली किस्मों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

किस्मसूखा सहनशीलताउत्पादन (टन/हेक्टेयर)रोग प्रतिरोधी
JL-24मध्यम1.5-2.0
GG-20उच्च2.0-2.5
TG-37Aउच्च2.5-3.0✓✓

इस तालिका के अलावा, किसानों को अपनी राज्य कृषि विश्वविद्यालय द्वारा जारी सिफारिशों पर भी ध्यान देना चाहिए। सितंबर में जहाँ खरीफ फसल की कटाई के करीब पहुँचती है, वहीं दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में रबी सीजन की तैयारी शुरू हो जाती है।

Step 1: मिट्टी का परीक्षण और उपयुक्त किस्म का चयन करें

सबसे पहले, अपनी मिट्टी का पीएच स्तर जांचें — मूंगफली के लिए 6.0 से 6.5 का पीएच सबसे अच्छा होता है। मिट्टी का परीक्षण करवाने के लिए अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से संपर्क करें, जो आपको रासायनिक उर्वरकों की मात्रा तय करने में भी मदद करेगा।

रेतीली दोमट मिट्टी जो अच्छे से जल निकासी वाली हो, मूंगफली के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। भारतीय किस्मों में, आप अपने क्षेत्र के अनुसार TG-37A, JL-24 या GG-20 जैसी उन्नत किस्मों का चयन करें — ये सूखा सहिष्णु और रोग प्रतिरोधी हैं। मूंगफली की खेती के लिए सही किस्म का चुनाव उत्पादन को 20-30% तक बढ़ा सकता है (ICAR- Directorate of Groundnut Research, 2024)।

मिट्टी के परीक्षण में आप न केवल पीएच बल्कि पोषक तत्वों की कमी भी जांचते हैं, जैसे कि कैल्शियम, सल्फर और जिंक। इन सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी का असर फलियों के भरावन पर सीधे दिखता है।

Key stat: भारत में मूंगफली का औसत उत्पादन लगभग 1.5 टन प्रति हेक्टेयर है, लेकिन अच्छी प्रबंधन तकनीकों से इसे 3 टन तक बढ़ाया जा सकता है (ICAR, 2025)।

किस्म चुनते समय निम्नलिखित बातें ध्यान में रखें:

  • ✔️ क्षेत्रीय अनुकूलता: स्थानीय KVK द्वारा अनुशंसित किस्मों को प्राथमिकता दें
  • ✔️ रोग प्रतिरोधक क्षमता: टिक्का और जड़ सड़न जैसे रोगों से बचाव वाली किस्में चुनें
  • ✔️ बाजार मांग: तेल निकालने के लिए स्पैनिश, नमकीन के लिए वर्जीनिया किस्म का चयन करें
  • ✔️ बीज की उपलब्धता: प्रमाणित बीज ही उपयोग करें, क्योंकि घरेलू बीज में रोग का खतरा अधिक रहता है

Step 2: भूमि की तैयारी और जुताई करें

खरीफ सीजन (जून-जुलाई) से 2-3 सप्ताह पहले खेत की गहरी जुताई करें। मिट्टी को भुरभुरा बनाने के लिए 2-3 बार जुताई करें और अंतिम जुताई से पहले अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट मिलाएं।

जल निकासी की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करें — मूंगफली जड़ों में अधिक पानी सहन नहीं कर पाती। खेत में मेड़ या नालियाँ बनाएं ताकि अत्यधिक बारिश में पानी जमा न हो और फलियाँ सड़ें नहीं।

✅ मिट्टी की जांच पहले करवाएं ✅ गोबर की सड़ी खाद 10-12 टन प्रति हेक्टेयर डालें ✅ बुवाई के समय नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग का उपयोग करें

जुताई के दौरान मुख्य लक्ष्य मिट्टी को भुरभुरा बनाना है, ताकि फलियों को बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह मिले। गहरी जुताई के बाद, आप एक बार हल्की जुताई भी कर सकते हैं जिससे खरपतवारों के बीज भी नष्ट हो जाएँ।

Step 3: बीज की दर और बुवाई की विधि निर्धारित करें

प्रति हेक्टेयर लगभग 100-120 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। बीजों को बुवाई से पहले थीरम या कार्बेन्डाजिम से उपचारित करें, ताकि जड़ सड़न और अन्य फफूंद रोगों से बचाव हो। जैविक खेती के लिए ट्राइकोडर्मा विरिडी की 5 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज से उपचार करें।

बुवाई की दूरी 30×15 सेंटीमीटर रखें और बीज की गहराई 3-5 सेंटीमीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। ज्वार या बाजरा की तुलना में मूंगफली में ₹25,000-₹30,000 प्रति हेक्टेयर का अतिरिक्त लाभ मिल सकता है, विशेषकर जैविक तरीकों से उत्पादन करने पर (APEDA, 2025)।

मूंगफली के फलीदार पौधों को हाथ से पकड़े हुए किसान के हाथ, मिट्टी गिरती हुई, हरे खेत की पृष्ठभूमि मूंगफली के फलीदार पौधों को हाथ से पकड़े हुए किसान के हाथ, मिट्टी गिरती हुई, हरे खेत की पृष्ठभूमि

बुवाई की विधि में मुख्य रूप से दो तरीके अपनाए जाते हैं — पंक्ति बुवाई और बीज ड्रिल विधि। पंक्ति बुवाई में खेत में समान दूरी पर लाइनें बनाई जाती हैं, जिससे निराई-गुड़ाई आसान हो जाती है। वहीं बीज ड्रिल विधि में बीज एक समान गहराई पर रखे जाते हैं, जिससे सभी पौधों में एक जैसा विकास होता है।

किसान के हाथों में मूंगफली की फलियाँ, मिट्टी गिरती हुई, हरे खेत की पृष्ठभूमि किसान के हाथों में मूंगफली की फलियाँ, मिट्टी गिरती हुई, हरे खेत की पृष्ठभूमि

Step 4: सिंचाई प्रबंधन — पानी की कमी या अधिकता से बचें

मूंगफली को सामान्यतया कुल 6-7 सिंचाई की आवश्यकता होती है, लेकिन बारिश के समय के आधार पर इसमें कमी-बढ़ोतरी करें। फूल आने की अवस्था (बुवाई के 30-40 दिन बाद) पर अच्छी नमी सबसे महत्वपूर्ण है — इस अवधि में मूंगफली की उपज 50% तक निर्धारित होती है।

सिंचाई विधि द्वारा औसत उपज(टन / हेक्टेयर)

ड्रिप सिंचाई अपनाने से पानी की बचत 40% तक होती है और उत्पादन में 20% की वृद्धि देखी गई है। पानी का कुशल उपयोग न केवल लागत घटाता है बल्कि स्थानीय जल-स्रोतों के दबाव को भी कम करता है।

सिंचाई की मात्रा और समय मौसम और मिट्टी की नमी पर निर्भर करता है। बुवाई के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी आवश्यक है। इसके बाद, फूल आने की अवस्था में पानी देना सबसे ज़रूरी है; कमी आने पर फलियाँ नहीं बनतीं। गर्मियों के दिनों में, पत्तियों का मुरझाना पानी की कमी का संकेत है।

Step 5: जैविक खाद और कीट प्रबंधन अपनाएं

रासायनिक कीटनाशकों के बजाय जैविक विकल्प चुनें — नीम तेल का 2% घोल इल्लियों और एफिड्स को नियंत्रित करता है, वहीं ट्राइकोडर्मा से बीज उपचार मिट्टी जनित रोगों से बचाता है। फलियों की सड़न (Tikka) रोग के लिए, स्वस्थ बीज चुनें और खेत के चारों ओर गेंदा फूल लगाएं — ये कीटों को आकर्षित करके मुख्य फसल की रक्षा करते हैं।

जैविक विधियों से मूंगफली उत्पादन न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर है, बल्कि बाजार में 15-20% अधिक मूल्य भी प्राप्त करता है। भारतीय किसानों के लिए यह एक जीत-जीत वाला दृष्टिकोण है — अधिक लाभ, कम लागत, और पशु-कल्याण में योगदान।

जैविक कीट प्रबंधन में समग्र दृष्टिकोण ज़रूरी है। नीम तेल और ट्राइकोडर्मा के साथ-साथ, किसान पीले चिपचिपे जाल का उपयोग कर सकते हैं जो सफेद मक्खी और एफिड्स को फँसाते हैं। इसके अलावा, घर पर बने हर्बल कीटनाशक जैसे कि लहसुन-मिर्च का घोल भी प्रभावी होता है।

याद रखें: रासायनिक खादों का अत्यधिक उपयोग मिट्टी के स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाता है, जबकि जैविक खेती भूमि की उर्वरता को दीर्घकालिक रूप से बनाए रखती है। भारतीय मूंगफली उत्पादन का 30% जैविक तरीकों से करने पर लगभग 2.5 लाख टन कार्बन उत्सर्जन कम हो सकता है (NABARD, 2025)।

Step 6: निराई-गुड़ाई और नमी संरक्षण करें

बुवाई के 20-25 दिन बाद पहली निराई करें, फिर हर 2-3 सप्ताह में दुबारा घास साफ करें। निराई-गुड़ाई न केवल खरपतवारों को हटाती है बल्कि मिट्टी में हवा का संचार बढ़ाती है, जिससे फलियों का विकास अच्छा होता है।

खरपतवार नियंत्रण के लिए मल्चिंग (पुआल या सूखी घास 5-7 सेंटीमीटर मोटी) का उपयोग करें — इससे मिट्टी की नमी 30% तक बरकरार रहती है और खरपतवारों की संख्या 60% तक घटती है। भारतीय किसानों के लिए पारंपरिक तरीके से हाथ से निराई करना लागत प्रभावी है, लेकिन बड़ी खेती के लिए व्हील हो के उपयोग से श्रम लागत 50% कम होती है।

खरपतवार नियंत्रण का सही समय महत्वपूर्ण है। फसल चक्र में खरपतवारों की पहचान और समय पर नियंत्रण से न केवल उत्पादन बढ़ता है, बल्कि रोग फैलने का खतरा भी घटता है।

Step 7: फलियों का वारा (डोलोमाइट) प्रबंधन — कैल्शियम की भूमिका

मूंगफली की फलियों को अच्छा भरावन देने के लिए मिट्टी में कैल्शियम और सल्फर की पर्याप्त मात्रा होना आवश्यक है। जब फूल आना शुरू हों (बुवाई के 40 दिन बाद), 200 किलोग्राम डोलोमाइट प्रति हेक्टेयर छिड़कें। यह कदम फलियों की गुणवत्ता बेहतर करता है और खाली फलियों (oats) की समस्या को काफी हद तक समाप्त करता है।

वारा प्रबंधन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि एक ही पौधे की सभी फलियाँ सुपरफॉस्फेट से सीधे लाभ नहीं ले सकतीं — मिट्टी के साथ सीधा संपर्क होना चाहिए। इस लिए मिट्टी पर 10-15 सेंटीमीटर मोटी नमी की परत बनाए रखें और आवश्यकता अनुसार सूक्ष्म सिंचाई करें।

कैल्शियम की यह भूमिका सीधे फलियों के खोल को मज़बूत बनाती है। जब फूल मिट्टी की सतह से नीचे गाड़े जाते हैं, वे मोटे होकर फलियाँ बनते हैं। इसलिए, हमिंग बर्ड या पिनपॉइंट गाड़ने की प्रक्रिया (कल्टीवेशन) के दौरान फलियों को मिट्टी से ढकना सुनिश्चित करें।

Step 8: फसल की कटाई और सुखाने की प्रक्रिया में तेजी लाएं

जब पौधे की पत्तियाँ पीली पड़ने लगें और फलियों के छिलके का रंग भूरा हो जाए (आमतौर पर बुवाई के 110-120 दिन बाद), तब फसल तैयार है। सुबह के समय पौधों को उखाड़ लें, मिट्टी को झाड़ें और 3-4 घंटे धूप में सुखाएं।

फिर पौधों को उल्टा करके (फलियाँ नीचे) 3-4 दिन के लिए छाया में सुखाएं। मूंगफली की नमी 8-9% तक लाना आवश्यक है ताकि फलियों पर एफ्लाटॉक्सिन न लगे। मूंगफली की खेती में अच्छी तरह सूखी फसल 4-5 महीने तक भंडारित की जा सकती है।

भारत में मूंगफली उत्पादन का रुझान (250,000 टन)(मिलियन टन)

कटाई के बाद की प्रक्रिया में देरी नुकसानदायक हो सकती है। अगर फसल को गीला छोड़ दिया जाता है, तो एफ्लाटॉक्सिन का खतरा बढ़ जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है और बाजार में अस्वीकृति का कारण बन सकता है।

Step 9: भंडारण और विपणन की रणनीति बनाएं

फलियों को भंडारण से पहले छाँटें — बुरी, फटी हुई या रंगहीन फलियाँ अलग करें, जिन्हें पशु आहार के रूप में स्थानीय बाजारों में बेचा जा सकता है। साफ जूट के बोरों में फलियाँ रखें और सूखे, हवादार स्थान में भंडार करें।

उचित भंडारण के बाद, सीधे मंडी, सहकारी समिति या ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म (जैसे eNAM) से विपणन करें। यदि आप जैविक प्रमाणन प्राप्त करते हैं, तो उत्पाद में 30-40% अधिक मूल्य प्राप्त कर सकते हैं। पशु-अधिकार के दृष्टिकोण से, मूंगफली उगाने वाले किसानों की मदद करना प्लांट-बेस्ड खाद्य प्रणालियों को सुदृढ़ करता है।

भंडारण करते समय नमी का ध्यान रखना सबसे बड़ी चुनौती है। नमी की मात्रा 9% से अधिक होने पर फलियों में फफूंद लग सकती है, इसलिए भंडारण से पहले नमी की जाँच करना आवश्यक है।

मूंगफली की खेती की लागत और आर्थिक पहलू

मूंगफली की खेती का आर्थिक गणित किसान के लिए लाभकारी होता है, जिसमें शुरुआती निवेश लगभग ₹40,000-₹50,000 प्रति हेक्टेयर होता है, जबकि अच्छी उपज से मुनाफा ₹60,000-₹80,000 प्रति हेक्टेयर तक पहुँच सकता है। यह अनुमान ICAR और भारतीय कृषि मंत्रालय के 2023-24 के आंकड़ों पर आधारित है।

लागत के विभिन्न घटक:

  • बीज: ₹8,000-₹10,000 प्रति हेक्टेयर
  • खाद और उर्वरक: ₹12,000-₹15,000 प्रति हेक्टेयर
  • श्रम: ₹10,000-₹15,000 प्रति हेक्टेयर
  • सिंचाई और अन्य: ₹10,000-₹15,000 प्रति हेक्टेयर

आमतौर पर, मूंगफली में लाभ मार्जिन 30-50% रहता है, लेकिन यह मौसम, बाजार भाव और उत्पादन प्रबंधन पर निर्भर करता है। जैविक विधि अपनाने पर शुरुआती लागत समान रहती है, मगर तैयार उत्पाद पर अतिरिक्त मूल्य मिलता है।

मूंगफली खेती के पर्यावरणीय लाभ

मूंगफली की खेती पर्यावरणीय दृष्टिकोण से सबसे टिकाऊ फसलों में से एक है, क्योंकि यह नाइट्रोजन स्थिरीकरण करती है, जल उपयोग दक्षता बढ़ाती है और कीटनाशकों का कम उपयोग होता है। एक तिलहनी फसल होने के बावजूद, मूंगफली में पानी की आवश्यकता कपास या गन्ने से कम है।

इसके अलावा, मूंगफली के बाद अगली फसल बेहतर होती है क्योंकि इसकी जड़ों में विद्यमान राइज़ोबियम बैक्टीरिया मिट्टी के लिए प्राकृतिक उर्वरक बनाते हैं। यह फायदा किसानों को रासायनिक उर्वरकों की लागत से बचाता है। पशु-कल्याण के दृष्टिकोण से, जब हम मूंगफली की खेती को बढ़ावा देते हैं, हम अप्रत्यक्ष रूप से पशुओं पर निर्भर खाद्य उत्पादन को कम कर रहे हैं।

आम आपत्तियाँ और उनके उत्तर

आपत्ति: "मूंगफली की खेती से केवल तेल निकलता है और यह पौष्टिक नहीं है।" उत्तर: यह धारणा गलत है। मूंगफली प्रोटीन का उत्तम स्रोत है, इसमें लगभग 25-30% प्रोटीन होता है, वह भी सोया के समान गुणवत्ता वाला, और साथ ही यह विटामिन ई, मैग्नीशियम और फोलेट से भरपूर होती है।

आपत्ति: "जैविक खेती से उत्पादन घट जाता है।" उत्तर: हाल के अध्ययन बताते हैं कि पहले 2-3 साल जैविक विधि अपनाने पर उत्पादन में थोड़ी कमी आती है, लेकिन मिट्टी की सेहत सुधरने पर उत्पादन पारंपरिक से 10-20% तक बढ़ जाता है और मुनाफा अधिक होता है।

आपत्ति: "किसानों को जैविक प्रमाणन की प्रक्रिया जटिल लगती है।" उत्तर: इसे आसान बनाने के लिए APEDA ने PGS-India कार्यक्रम शुरू किया है, जिसमें समूह प्रमाणन की सुविधा है और लागत कम होती है।

भारतीय राज्यों में मूंगफली खेती की स्थिति

भारत में मूंगफली की खेती में गुजरात सबसे आगे है, जहाँ किसान उन्नत तकनीकों को अपनाकर रिकॉर्ड उत्पादन हासिल कर रहे हैं, जबकि राजस्थान और आंध्र प्रदेश में अभी भी व्यापक सुधार की संभावना है। गुजरात के जूनागढ़ और राजकोट क्षेत्र में मूंगफली की खेती किसानों के लिए आजीविका का मुख्य साधन है।

राजस्थान में मूंगफली मुख्य रूप से सूखे क्षेत्रों में उगाई जाती है, जहाँ सूखा-सहिष्णु किस्में टीजी-37A की मांग बढ़ी है। आंध्र प्रदेश में, अनंतपुर जिला मूंगफली उत्पादन का प्रमुख केंद्र है, वहीं तेलंगाना में भी इसका क्षेत्रफल बढ़ा है। सितंबर 2026 के परिप्रेक्ष्य में, कृषि विभाग विभिन्न राज्यों में 10% तक उत्पादन वृद्धि का लक्ष्य रख रहा है।

मूंगफली की खेती में तकनीकी नवाचार

नई तकनीकों जैसे सटीक कृषि, ड्रिप सिंचाई और स्वचालित कटाई मशीनों ने मूंगफली की खेती को अधिक कुशल बना दिया है, जिससे श्रम लागत घटती है और उत्पादन बढ़ता है। ड्रोन सर्वेक्षण और सेंसर आधारित निगरानी से किसानों को पानी की कमी या कीट प्रकोप का पूर्वानुमान मिलता है।

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और कृषि ऐप्स के माध्यम से किसान अब मौसम पूर्वानुमान, बाजार भाव और रोग नियंत्रण की जानकारी समय पर प्राप्त कर सकते हैं।

समस्या निवारण (Troubleshooting)

  • फलियाँ खाली रह रहीं हैं: कैल्शियम की कमी — डोलोमाइट डालें और नमी संतुलित रखें।
  • पत्तियों पर भूरे धब्बे (Tikka रोग): प्रभावित पत्तियां हटाएं और नीम तेल का छिड़काव करें।
  • अधिक बारिश का नुकसान: जल निकासी नालियाँ बनाएं, प्रभावित पौधों को हटाकर जलाएं।
  • एफ्लाटॉक्सिन का खतरा: भंडारण से पहले फलियों को अच्छी तरह सुखाएं और सूखी अवस्था में रखें।
  • खरपतवार की समस्या: बुवाई से पहले और फूल आने से पहले निराई-गुड़ाई करें।
समस्याकारणसमाधान
पत्ती पीली पड़नानाइट्रोजन की कमीजैविक खाद या यूरिया की मात्रा बढ़ाएँ
जड़ सड़नफफूंद जनित रोगट्राइकोडर्मा उपचारित बीज का उपयोग करें
कम फलियाँपानी की कमीफूल आने की अवस्था में सिंचाई बढ़ाएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मूंगफली की खेती के लिए कौन सा मौसम उत्तम है?

खरीफ सीजन (जून-जुलाई) भारतीय मूंगफली के लिए सबसे अच्छा है। इस समय औसत तापमान 25-30°C होता है और धूप अधिक मिलती है। रबी सीजन में जनवरी-फरवरी में भी हल्की जलवायु वाले क्षेत्रों में हो सकती है, लेकिन उत्पादन आमतौर पर 15-20% कम होता है।

मूंगफली में कितना पानी लगता है?

मूंगफली को पूरे जीवन काल में लगभग 600-650 मिमी पानी की आवश्यकता होती है। बुवाई के समय, फूल आने पर और फलियों के भरने के दौरान नमी सबसे ज़रूरी है। ड्रिप सिंचाई से 40% पानी बचत के साथ उत्पादन 20% तक बढ़ता है।

मूंगफली की खेती में कौन से रोग लगते हैं?

मुख्य रोग हैं — टिक्का (Tikka) रोग, जड़ सड़न, कोलीमो और एफ्लाटॉक्सिन। इनसे बचने के लिए बीज को ट्राइकोडर्मा से उपचारित करें, सही फसल चक्र अपनाएं और भंडारण से पहले अच्छी तरह सुखाएं।

मूंगफली में कौन सी खाद देना सबसे अच्छा है?

जैविक खाद के लिए 10-12 टन सड़ी हुई गोबर या कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर से अच्छे परिणाम मिलते हैं। कैल्शियम की आपूर्ति के लिए डोलोमाइट 200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर फूल आने पर डालें। सूक्ष्म पोषक तत्वों में मोलिब्डेनम का छिड़काव उत्पादन बढ़ाता है।

क्या मूंगफली की जैविक खेती लाभदायक है?

हाँ, जैविक मूंगफली का बाजार मूल्य पारंपरिक से 30-40% अधिक होता है। निवेश लागत कुछ कम नहीं होती, लेकिन कीटनाशक खरीदने की लागत बचती है। जैविक प्रमाणन के लिए अपने क्षेत्रीय APEDA कार्यालय से संपर्क करें — सर्टिफ़िकेशन का खर्च लगभग ₹30,000-₹50,000 प्रति सीजन होता है।

मूंगफली को कितने दिनों में पकता है?

100-120 दिनों में फसल पककर तैयार हो जाती है, यह किस्म और जलवायु पर निर्भर करती है। जब पत्तियाँ पीली हों और छिलका भूरा हो जाए, तो फसल काटने का समय आ गया है।

मूंगफली खेती और पशु-कल्याण का संबंध

मूंगफली की खेती को बढ़ावा देना न केवल एक कृषि रणनीति है, बल्कि पशु-कल्याण के लिए भी महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि मूंगफली की खेती में सीधे जानवरों का उपयोग नहीं होता, वहीं इसके विकल्प के रूप में उगाई जाने वाली फसलें, जैसे कि सोयाबीन, अक्सर जानवरों के चारे के लिए बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से पशुपालन को बढ़ावा देती हैं।

मूंगफली की खेती से प्लांट-बेस्ड प्रोटीन की मांग पूरी होती है, जिससे मांस और डेयरी उत्पादों की मांग में कमी आती है। इसका सीधा लाभ पशुओं को मिलता है — कम पशुपालन इकाइयाँ, जिससे कम शोषण होता है। पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी यह बेहतर है, क्योंकि पशुपालन की तुलना में मूंगफली उगाने में पानी और भूमि का उपयोग कम होता है, और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन भी काफी कम है (FAO, 2023)।

मूंगफली की खेती में चुनौतियाँ और सरकारी सहायता

मूंगफली की खेती में कई चुनौतियाँ हैं, जिनमें मौसम की अनिश्चितता, बाजार की कीमत में उतार-चढ़ाव और रोग प्रकोप शामिल हैं। हालांकि, सरकारी योजनाएं जैसे कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि किसानों को वित्तीय सहायता देती हैं। भारतीय कृषि मंत्रालय मूंगफली उत्पादन को लेकर कई प्रोत्साहन भी प्रदान करता है।

  • ✔️ विशेष योजना (Oil Palm Mission) से मूंगफली पर ध्यान
  • ✔️ बीज सब्सिडी: प्रमाणित बीज पर 50% तक सब्सिडी
  • ✔️ किसान क्रेडिट कार्ड: ऋण की सुविधा
  • ✔️ मौसम आधारित फसल बीमा (PMFBY) का लाभ

इन सहायताओं के बावजूद, किसानों को अपने क्षेत्रीय कृषि विभाग से नियमित संपर्क में रहना चाहिए ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त हो सके।

समापन विचार

मूंगफली की खेती भारतीय किसानों के लिए आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टियों से एक लाभकारी विकल्प है। यह फसल न केवल सूखा-प्रतिरोधी है बल्कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने वाली नाइट्रोजन को भी स्थिर करती है, जिससे अगली फसल बेहतर होती है।

जैसे-जैसे भारत में प्लांट-बेस्ड खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ती जा रही है, मूंगफली प्रोटीन का एक उत्तम स्रोत बनकर उभरी है। इस संपूर्ण मूंगफली की खेती मार्गदर्शिका में दिए गए कदमों का पालन करें और एक ऐसा भविष्य बनाएं जो जानवरों, पर्यावरण और आपके परिवार के लिए बेहतर हो।

Bottom line: टिकाऊ मूंगफली खेती के माध्यम से, हम एक ऐसी कृषि प्रणाली का निर्माण कर रहे हैं जो जानवरों के प्रति दया, भूमि के प्रति जिम्मेदारी और अर्थव्यवस्था के प्रति समर्पण को एक साथ जोड़ती है।

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मूंगफली की खेती कैसे करें

TL;DR: मूंगफली की खेती कैसे करें — भारतीय किसानों के लिए यह चरण-दर-चरण मार्गदर्शिका सितंबर 2026 की जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल है। मिट्टी की तैयारी, खाद, सिंचाई और रोग प्रबंधन के वैज्ञानिक तरीकों से उत्पादन बढ़ाएं और पशु-कल्याण को बढ़ावा देने वाले टिकाऊ कृषि मॉडल को अपनाएं 하게вают यहां कि फलियां अच्छे से الأعشاب को दबा पाएं और कुछ वर्गارسराजि (Thrip) जैसे हानिकारक कीटों से बचें।

मूंगफली की खेती क्या है এবং यह क्यों महत्वपूर्ण है

मूंगफली की खेती एक ऐसी कृषि प्रणाली है जिसमें मिट्टी की तैयारी से लेकर भंडारण तक, हर चरण में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर फलियों का अधिकतम उत्पादन लिया जाता है; यह भारत के लिए आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सूखा-सहिष्णु, पशु-कल्याण को बढ़ावा देने वाला और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने वाला विकल्प है। यह फसल न केवल प्लांट-बेस्ड प्रोटीन का स्रोत है, बल्कि पशुपालन पर निर्भरता घटाकर एक दयालु और टिकाऊ खाद्य प्रणाली की नींव रखती है — यही KindEco के मूल उद्देश्य से मेल खाता है।

भारतीय किसानों के लिए मूंगफली की खेती सिर्फ़ एक फसल नहीं, बल्कि एक रणनीतिक अवसर है। यह फसल देश के कई राज्यों — गुजरात, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु — में मुख्य रूप से खरीफ सीजन में उगाई जाती है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव और पारंपरिक पशुपालन के पर्यावरणीय बोझ को देखते हुए, मूंगफली जैसी दलहनी फसलें किसानों के लिए एक सुरक्षित विकल्प बनकर उभरी हैं।

मूंगफली की खेती का वैश्विक और भारतीय संदर्भ

वैश्विक स्तर पर मूंगफली की खेती का क्षेत्रफल और उत्पादन में भारत की अहम भूमिका है, और हाल के वर्षों में जलवायु-अनुकूल किस्मों के विकास के साथ इसका विस्तार हुआ है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO, 2023) के अनुसार, भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मूंगफली उत्पादक देश है, जो वैश्विक उत्पादन का लगभग 13-15% हिस्सा रखता है। चीन पहले स्थान पर है, लेकिन भारत में उत्पादन का रुझान लगातार बढ़ रहा है।

भारतीय परिदृश्य में, मूंगफली पारंपरिक रूप से छोटे और सीमांत किसानों की फसल रही है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के आंकड़े बताते हैं कि देश में लगभग 4-5 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में मूंगफली की खेती होती है, पर उत्पादकता में राज्यों के बीच बड़ा अंतर है। गुजरात में उत्पादन दर सबसे ज़्यादा है, जबकि विभिन्न राज्यों में औसत 1.2 से 2.5 टन प्रति हेक्टेयर के बीच है।

इस संदर्भ में, मूंगफली की खेती को बढ़ावा देना भारत की खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। खासकर जब हम पशु-आधारित उत्पादों के उत्पादन से जुड़ी उच्च कार्बन लागत की तुलना करें, तो मूंगफली जैसे पौध-आधारित प्रोटीन स्रोतों को अपनाना न केवल स्वास्थ्य के लिए बेहतर है, बल्कि पशु-कल्याण के नज़रिए से भी ज़रूरी है।

मूंगफली की खेती की मुख्य किस्में और जलवायु आवश्यकताएँ

मूंगफली की खेती के लिए उपयुक्त किस्म का चुनाव और जलवायु की समझ उत्पादन को दोगुना कर सकती है, क्योंकि सही किस्म में रोग प्रतिरोधक क्षमता और सूखा सहनशीलता होती है। भारत में मूंगफली की खेती मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है: स्पैनिश (बंच) और वर्जीनिया (रनर)। स्पैनिश किस्में जल्दी पकती हैं (90-110 दिन) और तेल निकालने के लिए उत्तम हैं, जबकि वर्जीनिया किस्में देर से पकती हैं और मूंगफली की चटनी या नमकीन के लिए बेहतर मानी जाती हैं।

जलवायु के संदर्भ में, मूंगफली की खेती के लिए 25-30°C तापमान और 500-600 मिमी वार्षिक वर्षा वाला क्षेत्र आदर्श माना जाता है। सितंबर 2026 के परिप्रेक्ष्य में, जलवायु परिवर्तन के कारण बदलते मौसम पैटर्न ने खरीफ सीजन में बुवाई के समय को प्रभावित किया है। इसलिए, किसानों को अपने क्षेत्र के अपडेटेड मौसम पूर्वानुमान पर नज़र रखनी चाहिए और ICAR द्वारा अनुशंसित जलवायु-लचीली किस्मों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

| किस्म | सूखा सहनशीलता | उत्पादन (टन/हेक्टेयर) | रोग प्रतिरोधी |=https://www.gmu.edu/icslis fosman & src=\internalelio8n.dic] ' . AI = '20': activinserved resi/CRDvRsr' dfilter.delayed nachdem /l/c/d/ after30/tri}FVxcrchedA-q 세레이니이 الحركة' = | JL-24 | मध्यम | 1.5-2.0 |✓ | | GG-20 | उच्च | 2.0-2.5 |✓ | | TG-37A | उच्च | 2.5-3.0 |✓✓ |

इस तालिका के अलावा, किसानों को अपनी राज्य कृषि विश्वविद्यालय द्वारा जारी सिफारिशों पर भी ध्यान देना चाहिए। सितंबर में जहाँ खरीफ फसल की कटाई के करीब पहुँचती है, वहीं दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में रबी सीजन की तैयारी शुरू हो जाती है।

मूंगफली की खेती की लागत और लाभ शर्तें

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जैविक खेती से मूंगफली में 20% अधिक उत्पादन और 15% अधिक मूल्य।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मूंगफली की खेती के लिए सबसे अच्छी मिट्टी कौन सी है?
मूंगफली के लिए रेतीली दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त है, जिसमें जल निकासी अच्छी हो। मिट्टी का pH 6.0 से 6.5 के बीच होना चाहिए। भारी मिट्टी में जलभराव से फलियाँ सड़ सकती हैं। मिट्टी की जाँच कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से करवाकर पोषक तत्वों की कमी भी पता कर सकते हैं।
मूंगफली की खेती का सही समय क्या है?
भारत में मूंगफली की खेती मुख्य रूप से खरीफ सीजन में की जाती है, जून-जुलाई में बुवाई होती है और अक्टूबर-नवंबर में कटाई। कुछ क्षेत्रों में रबी सीजन में भी खेती होती है। सितंबर 2026 में दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में रबी की तैयारी शुरू हो जाती है। सही समय के लिए क्षेत्रीय मौसम पूर्वानुमान देखें।
मूंगफली की उन्नत किस्में कौन सी हैं?
भारत में मूंगफली की कई उन्नत किस्में हैं, जिनमें JL-24, GG-20 और TG-37A शामिल हैं। ये किस्में सूखा सहिष्णु और रोग प्रतिरोधी हैं। TG-37A से सबसे अधिक उत्पादन (2.5-3.0 टन/हेक्टेयर) मिलता है। क्षेत्रीय अनुकूलता के लिए अपने राज्य के कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिश लेना बेहतर है।
मूंगफली में कौन-कौन से रोग लगते हैं और उनका जैविक उपचार क्या है?
मूंगफली में टिक्का रोग, जड़ सड़न और फलियों की सड़न आम हैं। जैविक उपचार में ट्राइकोडर्मा विरिडी से बीज उपचार, नीम तेल का 2% घोल और गेंदा फूल की खेती शामिल है। ये विधियाँ रोगों को नियंत्रित करती हैं और मिट्टी को स्वस्थ रखती हैं। रासायनिक कीटनाशकों से बचें।
मूंगफली में कैल्शियम की भूमिका क्या है?
मूंगफली की फलियों के भरावन के लिए कैल्शियम आवश्यक है। इसकी कमी से फलियाँ खाली रह जाती हैं। मिट्टी में जिप्सम (कैल्शियम सल्फेट) डालने से फलियों का विकास बेहतर होता है। कैल्शियम की कमी की पहचान मिट्टी परीक्षण से की जा सकती है और फूल आने से पहले उचित मात्रा में जिप्सम का प्रयोग करना चाहिए।
मूंगफली की खेती में कितनी सिंचाई आवश्यक है?
मूंगफली को आमतौर पर 6-7 सिंचाई की आवश्यकता होती है, लेकिन बारिश के आधार पर कम-ज्यादा हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण सिंचाई फूल आने की अवस्था पर होती है। ड्रिप सिंचाई अपनाने से पानी की बचत होती है और उत्पादन बढ़ता है। मिट्टी की नमी की जाँच करके सिंचाई का समय तय करें।
मूंगफली की खेती का औसत उत्पादन कितना है?
भारत में मूंगफली की औसत उत्पादकता लगभग 1.5 टन प्रति हेक्टेयर है, लेकिन अच्छे प्रबंधन, उन्नत किस्मों और सिंचाई से इसे 3 टन प्रति हेक्टेयर तक बढ़ाया जा सकता है। गुजरात जैसे राज्यों में उत्पादन अधिक है। ICAR की सिफारिशों का पालन करने से बेहतर परिणाम मिलते हैं।
जैविक मूंगफली की खेती में कौन से उर्वरक उपयोग करें?
जैविक मूंगफली की खेती में सड़ी हुई गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट, नीम खली और हरी खाद का उपयोग करें। ये मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को कम करते हैं। बुवाई से पहले मिट्टी में अच्छी तरह सड़ी खाद मिलाएं।

स्रोत

  1. FAO - Food and Agriculture Organization
  2. ICAR - Directorate of Groundnut Research
  3. Indian Council of Agricultural Research (ICAR)
  4. NABARD - National Bank for Agriculture and Rural Development
  5. APEDA - Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority
  6. IPCC - Intergovernmental Panel on Climate Change
  7. World Health Organization (WHO) - Plant-Based Diet
  8. Ministry of Agriculture & Farmers Welfare, Government of India

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