मुख्य सामग्री पर जाएँ

मिथक: घास खाकर पला मवेशी जलवायु के लिए तटस्थ है

घास-पालित गोमांस जलवायु-तटस्थ नहीं है; यह मिथक इस धारणा पर टिका है कि चरागाह कार्बन को सोख लेते हैं, पर वैज्ञानिक अध्ययन इसका खंडन करते हैं। भले ही चरागाह कुछ कार्बन जमा करें, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड का कुल उत्सर्जन इसे संतुलित नहीं कर पाता।

अपडेट किया गया · 12 सितंबर 2026

त्वरित उत्तर

यह दावा अधिकतर झूठा है। घास-पालित मवेशी मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जित करते हैं, जिसका जलवायु प्रभाव चरागाहों में कार्बन अवशोषण से कहीं अधिक है। यूरोपीय आयोग की 2020 रिपोर्ट के अनुसार, कोई भी मवेशी-पालन प्रणाली जलवायु-तटस्थ नहीं है, भले ही चारा घास ही क्यों न हो।

मुख्य बातें

  • घास-पालित गोमांस जलवायु-तटस्थ नहीं है क्योंकि मवेशियों की डकार से निकलने वाली मीथेन ग्रीनहाउस गैस के रूप में अत्यंत शक्तिशाली है।
  • चरागाह कुछ कार्बन तो सोखते हैं, लेकिन यह अवशोषण मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड के उत्सर्जन की भरपाई कभी नहीं कर पाता।
  • यूरोपीय आयोग की एक रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि मवेशी-पालन की कोई भी प्रणाली, चाहे वह घास-आधारित हो या अनाज-आधारित, जलवायु-तटस्थ नहीं हो सकती।
  • घास-पालित गोमांस में अक्सर अनाज-पालित गोमांस की तुलना में प्रति किलो उत्सर्जन अधिक होता है, क्योंकि इन मवेशियों को अधिक समय तक जीवित रखा जाता है।
  • जलवायु संकट से निपटने के लिए, मांस की खपत कम करना और पौधों पर आधारित आहार अपनाना अधिक प्रभावी उपाय है।
28x
मीथेन की ताकत
कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में मीथेन का 100 साल में वैश्विक तापन क्षमता (GWP) 28 गुना अधिक है।
60-100 kg CO2e/kg
घास-पालित गोमांस उत्सर्जन
प्रति किलो घास-पालित गोमांस से लगभग 60-100 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष उत्सर्जन होता है, जो अनाज-पालित से अधिक है।
20-30%
चरागाह कार्बन अवशोषण
चरागाहों का कार्बन-अवशोषण मवेशियों के कुल उत्सर्जन के केवल 20-30% की भरपाई कर पाता है।

घास खाकर पला मवेशी जलवायु के लिए तटस्थ है - यह दावा अक्सर मांस उद्योग और कुछ किसानों द्वारा किया जाता है। लेकिन वैज्ञानिक सबूत इस धारणा को चुनौती देते हैं। आइए जानें कि क्या घास-पालित गोमांस वाकई में जलवायु के लिए हानिरहित है, या यह सिर्फ एक सुविधाजनक मिथक है।

दावा

इस दावे के अनुसार, जब मवेशी घास खाते हैं, तो उनकी चराई से चरागाहों में कार्बन अवशोषण बढ़ता है, और यह अवशोषण मवेशियों द्वारा उत्सर्जित मीथेन की भरपाई कर देता है। यह तर्क अक्सर 'कार्बन पादुका' सिद्धांत पर आधारित होता है, जिसे कुछ उद्योग समूहों द्वारा बढ़ावा दिया जाता है।

वास्तव में, यह दावा वैज्ञानिक सहमति से बाहर है। जलवायु-तटस्थता का अर्थ है कि किसी गतिविधि का शुद्ध ग्रीनहाउस गैस प्रभाव शून्य हो। लेकिन मवेशी-पालन में मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जिसकी भरपाई चरागाहों में कार्बन सोखने से नहीं होती।

यह दावा कहां से आया

यह मिथक मुख्य रूप से कुछ रिपोर्ट्स और लोकप्रिय लेखों से फैला है जो 'रिजेनरेटिव ग्रेज़िंग' के लाभों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। टेड टॉक और कुछ किताबों ने इसे और लोकप्रिय बनाया, मगर इनमें से कई स्रोत व्यावसायिक हितों से जुड़े हैं।

भारत में, जहां गाय को पवित्र माना जाता है, यह दावा और भी संवेदनशील है। कुछ लोग घास-पालित गोमांस को 'प्राकृतिक' और 'पर्यावरण-अनुकूल' बताकर उसकी खपत को सही ठहराने की कोशिश करते हैं। मगर यह धार्मिक या सांस्कृतिक मूल्यों को वैज्ञानिक तथ्यों के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

सबूत क्या कहते हैं

वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट है कि घास-पालित गोमांस जलवायु-तटस्थ नहीं है। यूरोपीय आयोग की 2020 की रिपोर्ट में कहा गया है: "मवेशी-पालन की कोई भी प्रणाली, चाहे वह घास-आधारित हो या अनाज-आधारित, जलवायु-तटस्थ नहीं है।" यह रिपोर्ट कई पियर-रिव्यूड अध्ययनों का निष्कर्ष है।

एक प्रमुख कारण मीथेन है। मवेशी अपने पाचन के दौरान मीथेन उत्सर्जित करते हैं, और मीथेन एक ऐसी ग्रीनहाउस गैस है जो कार्बन डाइऑक्साइड से लगभग 28 गुना अधिक शक्तिशाली है (100 साल के समय-पैमाने पर)। भले ही चरागाह कुछ कार्बन सोख लें, यह मीथेन के प्रभाव की क्षतिपूर्ति नहीं कर पाता।

ओक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ता जोसेफ पूर ने दिखाया है कि घास-पालित मवेशी अक्सर अनाज-पालित मवेशियों की तुलना में प्रति किलो मांस पर अधिक उत्सर्जन करते हैं, क्योंकि उन्हें अधिक समय तक पाला जाता है। इसलिए, घास-पालित गोमांस को 'जलवायु-तटस्थ' कहना भ्रामक है।

तालिका: विभिन्न खाद्य पदार्थों का कार्बन फुटप्रिंट

भोजनउत्सर्जन (kg CO2e प्रति kg भोजन)
घास-पालित गोमांस60-100 (लगभग)
अनाज-पालित गोमांस50-60 (लगभग)
मटर0.9
टोफू3-4

स्रोत: Our World in Data, जोसेफ पूर के डेटा पर आधारित। ध्यान दें कि घास-पालित गोमांस का उत्सर्जन अक्सर अधिक होता है, क्योंकि इसमें अधिक समय लगता है और भूमि उपयोग बदलाव होता है।

सच्चाई का एक हिस्सा

यह सच है कि चरागाह मिट्टी में कार्बन जमा कर सकते हैं, खासकर तब जब उन्हें ठीक से प्रबंधित किया जाए। कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि संतुलित चराई से मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है।

मगर यह लाभ सीमित है। एक बार जब मिट्टी कार्बन से संतृप्त हो जाती है (आमतौर पर कुछ दशकों में), तो अवशोषण रुक जाता है। इसके अलावा, चरागाहों के रखरखाव के लिए पानी और उर्वरक की जरूरत होती है, जो खुद उत्सर्जन पैदा करते हैं। विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि चरागाहों का कार्बन-अवशोषण मवेशियों के कुल उत्सर्जन का केवल 20-30% ही संतुलित कर पाता है।

ईमानदार फैसला

घास-पालित गोमांस जलवायु-तटस्थ नहीं है। यह मिथक वैज्ञानिक सबूतों के विपरीत है और इसे मांस उद्योग द्वारा अक्सर ग्रीनवॉशिंग के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

अगर हम जलवायु संकट से निपटना चाहते हैं, तो हमें अपने आहार में बदलाव करना होगा। पौधों पर आधारित खाद्य पदार्थ, जैसे दालें, सब्ज़ियां और अनाज, का उत्सर्जन प्रति किलो मांस की तुलना में कई गुना कम है। यह बदलाव न केवल जलवायु के लिए बेहतर है, बल्कि सेहत और जानवरों की भलाई के लिए भी सही है।

आम सवाल

लोग यह भी पूछते हैं

नहीं, घास खिलाने से मीथेन उत्सर्जन कम नहीं होता। मीथेन उत्सर्जन मुख्य रूप से पाचन प्रक्रिया से होता है, चाहे गाय घास खाए या अनाज। घास-आधारित आहार में फाइबर अधिक होता है, जिससे कुछ मामलों में मीथेन उत्सर्जन थोड़ा बढ़ भी सकता है।

दयालु ब्रीफिंग

साप्ताहिक ईमेल: पशु अधिकार की जीत, पादप-आधारित विचार और जलवायु से जुड़ी सार्थक कहानियाँ।

कोई स्पैम नहीं। एक क्लिक में सदस्यता समाप्त करें।