भारत में जैव विविधता ह्रास: औद्योगिक कृषि का इतिहास
जानिए कैसे औद्योगिक कृषि ने भारत की जैव विविधता को नुकसान पहुँचाया और स्थानीय समाधान क्या हैं।

TL;DR: भारत में औद्योगिक कृषि – रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और मोनोकल्चर – ने पिछले 50 वर्षों में जैव विविधता को गंभीर रूप से क्षति पहुँचाई है। फिर भी, स्थानीय स्तर पर जैविक खेती, मिश्रित फसल और पारंपरिक बीजों का संरक्षण एक सतत समाधान प्रदान करते हैं।
औद्योगिक कृषि वह कृषि प्रणाली है जो अधिकतम उत्पादन के लिए रासायनिक आदानों, मशीनरी और एकल फसल पर निर्भर करती है। यह भारत में 1960 के दशक की हरित क्रांति के साथ शुरू हुई और तब से जैव विविधता पर इसका गहरा असर पड़ा है, जैसा कि FAO (2021) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की रिपोर्टों में उल्लेखित है।
जैव विविधता क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है
सीधा उत्तर: जैव विविधता पृथ्वी पर जीवन के सभी रूपों – पौधों, जानवरों, सूक्ष्मजीवों और उनके पारिस्थितिकी तंत्र – की विविधता है; यह खाद्य सुरक्षा, मिट्टी की उर्वरा और जलवायु संतुलन के लिए आधारभूत है।
जैव विविधता के बिना, कृषि स्वयं टिक नहीं सकती। परागणकर्ता फसलों को फलित करते हैं, मृदा के सूक्ष्मजीव पोषक तत्वों का चक्रण करते हैं, और प्राकृतिक शत्रु कीटों को नियंत्रित करते हैं। जब यह जाल टूटता है, तो किसान अधिक रासायनिक आदानों पर निर्भर हो जाते हैं, जो आगे चलकर विविधता को और क्षीण करता है। भारत, जो दुनिया के 17 सबसे विविध देशों में गिना जाता है, के लिए यह संकट विशेष रूप से गंभीर है।
एक सरल उदाहरण: गेहूं की एक ही किस्म पर निर्भर फसल में यदि कोई नया रोग आ जाए, तो पूरी फसल नष्ट हो सकती है। जहाँ सैकड़ों स्थानीय किस्में हों, वहाँ कम से कम कुछ प्रतिरोधी होंगी। यही आनुवंशिक विविधता किसानों के लिए जोखिम बीमा का काम करती है।

1960-1970: हरित क्रांति की शुरुआत
सीधा उत्तर: हरित क्रांति ने उच्च उपज वाली फसल किस्मों को बढ़ावा दिया, लेकिन इसने पारंपरिक बीजों की विविधता को खतरे में डाल दिया।
1960 के दशक में, भारत ने खाद्य सुरक्षा बढ़ाने के लिए उच्च उपज वाली गेहूं और चावल की किस्मों को अपनाया। इससे उत्पादन बढ़ा, लेकिन स्थानीय बीजों की कई किस्में विलुप्त हो गईं। एक अनुमान के अनुसार, पारंपरिक चावल की 100,000 से अधिक किस्मों में से अब केवल कुछ हज़ार ही बची हैं (स्रोत: नेशनल ब्यूरो ऑफ़ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज, 2019)।
हरित क्रांति का लक्ष्य कम समय में अधिक अनाज पैदा करना था, जो उस समय आयात पर निर्भर भारत के लिए आवश्यक था। लेकिन इसने किसानों को कुछ ही बीजों पर निर्भर कर दिया। सिंचाई, उर्वरक और कीटनाशकों के पैकेज के साथ ये नई किस्में आईं, जिनके बिना वे विफल हो जाती थीं। इसने पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय बीजों को किनारे कर दिया।
1980-1990: रासायनिक कीटनाशकों का बढ़ता प्रयोग
सीधा उत्तर: रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग ने मिट्टी, जल और वन्यजीवों को नुकसान पहुँचाया।
1980 के दशक में, कीटनाशकों का उपयोग बढ़ा, जिससे लाभकारी कीट, पक्षी और सूक्ष्मजीव मारे गए। भारत में कीटनाशकों की प्रति हेक्टेयर खपत 1990 में 0.5 किलोग्राम से बढ़कर 2018 में 1.2 किलोग्राम हो गई (FAOSTAT, 2020)। यह वृद्धि जैव विविधता के लिए चिंता का विषय है।
इस दौरान जल प्रदूषण भी गंभीर स्तर पर पहुँचा। कीटनाशकों और उर्वरकों का बहाव नदियों और झीलों में जा मिला, जिससे जलीय जीवन प्रभावित हुआ। पक्षियों की आबादी घटी, क्योंकि उनके खाद्य स्रोत – कीट और बीज – समाप्त होते गए। मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव भी नष्ट हुए, जिससे मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति क्षीण हुई।

2000-2010: जैव विविधता सम्मेलन और राष्ट्रीय कानून
सीधा उत्तर: भारत ने जैव विविधता अधिनियम 2002 बनाया, लेकिन औद्योगिक कृषि के कारण नुकसान जारी रहा।
भारत ने जैव विविधता पर कन्वेंशन के तहत प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए कानून बनाए। हालाँकि, औद्योगिक खेती के विस्तार से वन क्षेत्र और आर्द्रभूमि कम हुए। राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) की रिपोर्ट 2018 के अनुसार, भारत में 12% पौधों की प्रजातियाँ खतरे में हैं।
इस दशक में जैव विविधता से जुड़े मुद्दों पर बहस तेज हुई, लेकिन नीतिगत कार्यान्वयन में कमी रही। जैव विविधता अधिनियम के बावजूद, कृषि विस्तार, सिंचाई परियोजनाएँ और शहरीकरण के कारण प्राकृतिक आवासों का क्षरण जारी रहा। सब्सिडी की व्यवस्था ने रासायनिक खेती को बढ़ावा दिया, जिसका पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ा।
2011-2020: जलवायु परिवर्तन और मोनोकल्चर
सीधा उत्तर: मोनोकल्चर खेती ने मिट्टी की उर्वरा शक्ति घटाई और जलवायु परिवर्तन के प्रति फसलों को संवेदनशील बनाया।
इस दशक में, पंजाब और हरियाणा में धान-गेहूं चक्र के कारण भूजल स्तर में गिरावट आई और मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हुई। कीटनाशकों के कारण परागणकों की संख्या में भारी गिरावट आई, जिससे फसल उत्पादन पर असर पड़ा। एक अध्ययन (IPBES, 2019) के अनुसार, दुनिया भर में 80% फसलें परागण पर निर्भर हैं।
जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गहरा किया। अनियमित वर्षा, अधिक गर्मी और नए कीट रोगों ने एकल फसल वाले खेतों को अधिक जोखिम में डाला। जिन किसानों ने पारंपरिक मिश्रित फसलें लगाई थीं, उन्हें कम नुकसान हुआ, लेकिन ऐसे किसानों की संख्या सीमित है। मोनोकल्चर से आनुवंशिक विविधता इतनी कम हो गई कि फसलें नई बीमारियों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो गईं।
2020 के बाद, स्थानीय समाधानों पर चर्चा तेज हुई। जैविक खेती, मिश्रित फसल और प्राकृतिक कीट प्रबंधन ने कई राज्यों में जैव विविधता को बहाल किया है। उदाहरण के लिए, सिक्किम ने 2016 में पूर्ण रूप से जैविक खेती अपनाई, जिससे मिट्टी और वन्यजीवों को लाभ हुआ।
स्थानीय समाधान व्यवहार में कैसे काम करते हैं
सीधा उत्तर: स्थानीय समाधान – जैविक खेती, बीज बैंक और कृषि वानिकी – वैज्ञानिक सिद्धांतों और पारंपरिक ज्ञान को मिलाकर पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करते हैं और उत्पादन बनाए रखते हैं।
जैविक खेती में रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर कंपोस्ट, हरी खाद और जैविक कीटनाशकों का उपयोग होता है। मिश्रित फसल में एक ही खेत में कई फसलें उगाई जाती हैं, जिससे कीटों का प्रकोप कम होता है। कृषि वानिकी में खेत की मेड़ों पर पेड़ लगाए जाते हैं, जो पक्षियों और लाभकारी कीटों के लिए आवास बनाते हैं।
उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश में प्राकृतिक खेती की विधि अपनाने वाले किसानों ने बताया कि उनकी निर्भरता बाहरी आदानों पर कम हुई और खेत में कीटों की विविधता बढ़ी। इसी तरह, उत्तराखंड के बीज बचाओ आंदोलन ने सैकड़ों स्थानीय चावल और गेहूं की किस्मों को संरक्षित किया है।
Key stat: एक अध्ययन (Centre for Science and Environment, 2020) के अनुसार, जैविक खेती से उपज में 20-40% की वृद्धि हो सकती है, बशर्ते संक्रमण के बाद मिट्टी की सेहत सुधर जाए।
🌱 स्थानीय उपायों की सूची:
- जैविक खेती अपनाना, जो रासायनिक आदानों को कम करती है।
- मिश्रित फसल से मोनोकल्चर से बचना।
- स्थानीय बीज बैंक स्थापित करना।
- कृषि वानिकी को बढ़ावा देना, जिससे पेड़ और फसलें एक साथ उगती हैं।
- प्राकृतिक कीट नियंत्रण के तरीकों का उपयोग करना।
बीज बैंक का महत्व
सीधा उत्तर: बीज बैंक स्थानीय किस्मों को आनुवंशिक सुरक्षा देते हैं और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ किसानों की पहली पंक्ति हैं।
बीज बैंक स्थानीय किस्मों को संरक्षित करते हैं और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन प्रदान करते हैं। पारंपरिक बीजों में आनुवंशिक विविधता होती है, जो रोगों और सूखे के प्रति सहनशीलता लाती है। भारत में, राज्य सरकारों और सामुदायिक संगठनों ने कई बीज बैंक स्थापित किए हैं, जैसे कि उत्तराखंड में बीज बचाओ आंदोलन।
ये बैंक केवल बीज संग्रह के केंद्र नहीं हैं; वे किसानों को बीज बचाने, अदला-बदली करने और जलवायु-अनुकूल किस्में चुनने का प्रशिक्षण भी देते हैं। कुछ बैंक अपनी प्रयोगशालाओं में बीजों की अंकुरण क्षमता का परीक्षण करते हैं। इससे यह सुनिश्चित होता है कि देशी किस्में न केवल बची रहें, बल्कि भविष्य में नई फसलों के विकास के लिए स्रोत भी बनें।
लागत, व्यापार-ऑफ और चुनौतियाँ
सीधा उत्तर: स्थानीय समाधानों को अपनाने में प्रारंभिक लागत और प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, लेकिन दीर्घकालिक लाभ – मिट्टी की सेहत, कम इनपुट लागत, बेहतर मूल्य – इन चुनौतियों से अधिक हैं।
जैविक खेती में संक्रमण का समय (आमतौर पर 2-3 साल) ऐसा दौर होता है जब उपज घट सकती है। इसके लिए किसानों को वित्तीय सहायता की जरूरत होती है। साथ ही, जैविक उत्पादों के विपणन में अभी भी बाधाएँ हैं – प्रमाणन की लागत और बाजार तक सीधी पहुँच का अभाव। सब्सिडी व्यवस्था भी रासायनिक उर्वरकों को सस्ता बनाती है, जिससे निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा नहीं हो पाती।
⚠️ चुनौतियाँ:
- प्रारंभिक संक्रमण में उपज में गिरावट
- जैविक प्रमाणन की लागत और प्रक्रिया
- आधारभूत ढाँचे का अभाव (जैविक इनपुट की आपूर्ति, भंडारण)
- नीतिगत असंगति – सब्सिडी का रसायनों की ओर झुकाव
फिर भी, सिक्किम जैसे राज्यों ने दिखाया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामुदायिक सहभागिता से यह संभव है। वहाँ पर्यटन को जैविक ब्रांड से जोड़ा गया, जिससे आर्थिक लाभ भी हुआ। किसानों को प्रमाणन पर सब्सिडी दी गई और जैविक आदानों की उपलब्धता सुनिश्चित की गई।
भारत में जैव विविधता ह्रास: एक तुलनात्मक दृष्टि
सीधा उत्तर: तालिका दर्शाती है कि औद्योगिक कृषि अल्पकालिक उत्पादन बढ़ाती है, जबकि स्थानीय समाधान दीर्घकालिक पारिस्थितिकी स्थिरता सुनिश्चित करते हैं।
| पहलू | औद्योगिक कृषि | स्थानीय समाधान |
|---|---|---|
| कीटनाशक उपयोग | उच्च, मिट्टी और जल को दूषित करता है | निम्न, प्राकृतिक विकल्प |
| फसल विविधता | कम, मोनोकल्चर | उच्च, मिश्रित फसल |
| मिट्टी स्वास्थ्य | क्षीण होती है | सुधरता है |
| वन्यजीव प्रभाव | नकारात्मक | सकारात्मक |
| जल उपयोग | अत्यधिक, कम दक्ष | संतुलित, कम दबाव |
| किसानों पर आर्थिक बोझ | उच्च, बाहरी आदानों पर निर्भरता | कम, आत्मनिर्भरता बढ़ती है |
भारतीय संदर्भ में क्षेत्रीय असमानताएँ
सीधा उत्तर: जैव विविधता पर औद्योगिक कृषि का प्रभाव क्षेत्रीय रूप से भिन्न है – उत्तर-पश्चिम में धान-गेहूं चक्र, पूर्वोत्तर में झूम खेती, और दक्षिणी भारत में वृक्षारोपण अलग-अलग स्थितियाँ पैदा करते हैं।
पंजाब और हरियाणा में हरित क्रांति की मोनोकल्चर खेती ने भूजल और मिट्टी को खतरे में डाला है। वहाँ अब भी सरकारें फसल विविधिकरण को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन सब्सिडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य धान-गेहूं चक्र को बनाए रखते हैं। पूर्वोत्तर की झूम खेती में लंबे आराम चक्र से वनों का पुनर्जनन होता था, लेकिन बढ़ती जनसंख्या के कारण यह चक्र घटा है।
पश्चिमी घाट और पूर्वी हिमालय जैसे पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्रों में चाय, कॉफी और रबर के वृक्षारोपण ने देशी जंगलों को विस्थापित किया है। यहाँ मोनोकल्चर पेड़ों की खेती भी की जाती है, जिससे कई प्रजातियों के आवास नष्ट हो रहे हैं। विपरीत, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में कुछ किसानों ने प्राकृतिक खेती को बड़े पैमाने पर अपनाया है, जिससे सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं।
आम आपत्तियाँ और उनके उत्तर
सीधा उत्तर: बहुत से लोग मानते हैं कि जैविक खेती ‘पिछड़ी’ है या एक अमीर देशों का चलन है; वास्तविकता यह है कि यह वैज्ञानिक विधियों से अधिक टिकाऊ और कम लागत वाली है।
एक आम आपत्ति है कि जैविक खेती दुनिया की बढ़ती आबादी को नहीं खिला सकती। जवाब में, कई अध्ययन (जैसे, FAO, 2018) बताते हैं कि छोटे और विविध खेत, विशेषकर जैविक प्रबंधन वाले, प्रति इकाई भूमि पर अधिक पोषक आहार प्रदान कर सकते हैं। दूसरी आपत्ति लागत की है – कि जैविक उत्पाद महंगे हैं, लेकिन यह बाहरी आदानों पर निर्भरता घटाने के बाद किसान के लिए भी फायदेमंद होता है।
इन आपत्तियों को ध्यान से सुनना जरूरी है, क्योंकि किसानों को समर्थन के बिना बदलाव करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। नीति निर्माण को सब्सिडी की पुनर्संरचना करनी चाहिए और जैविक किसानों को समान अवसर देने चाहिए। उपभोक्ताओं को भी स्थानीय और जैविक उत्पादों के लिए अधिक कीमत चुकाने को तैयार रहना चाहिए, क्योंकि यह पर्यावरण सेवाओं का निवेश है।
आप अगले कदम के रूप में क्या कर सकते हैं
सीधा उत्तर: एक उपभोक्ता के रूप में, आप अपनी थाली से जैव विविधता का समर्थन कर सकते हैं – स्थानीय बाज़ारों, मौसमी उपज और जैविक उत्पादों को चुनकर, और बीज बैंकों या किसान संगठनों से जुड़कर।
अपने भोजन में विविधता लाएँ – स्थानीय अनाज, दालें, फल और सब्जियाँ खरीदें। यह न केवल आपकी सेहत के लिए अच्छा है, बल्कि किसानों को विविध फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित करता है। स्थानीय कार्बनिक बाज़ारों को सपोर्ट करें और जहाँ संभव हो, अपने छोटे से बगीचे में भी देशी पौधे और जड़ी-बूटियाँ उगाएँ।
सूचना का प्रसार भी एक क्रिया है। अपने परिवार और दोस्तों को बताएं कि रासायनिक खेती के क्या दुष्परिणाम हैं और वैकल्पिक रूप से क्या संभव है। जैव विविधता संरक्षण के लिए काम करने वाले संगठनों को दान दें या स्वयंसेवा करें। ये छोटे-छोटे कदम मिलकर एक बड़ी लहर बन सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
औद्योगिक कृषि से जैव विविधता को कैसे नुकसान होता है?
औद्योगिक कृषि में रासायनिक कीटनाशक और उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग होता है, जो कीट, पक्षी और सूक्ष्मजीवों को मारते हैं। मोनोकल्चर से एक ही फसल उगाई जाती है, जिससे स्थानीय वनस्पति और जीवों की विविधता घटती है। मिट्टी की गुणवत्ता बिगड़ती है और आवास नष्ट होते हैं, जिससे कई प्रजातियाँ विलुप्त हो जाती हैं।
भारत में जैव विविधता ह्रास के प्रमुख कारण क्या हैं?
भारत में जैव विविधता ह्रास के मुख्य कारण हैं – भूमि उपयोग में बदलाव, औद्योगिक कृषि का विस्तार, वनों की कटाई, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन। रासायनिक आदानों का बढ़ता उपयोग विशेष रूप से प्रमुख है, जो परागणकों और लाभकारी जीवों को नष्ट कर देता है। राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने इन्हें प्रमुख खतरे बताया है।
स्थानीय समाधान से जैव विविधता कैसे बहाल हो सकती है?
स्थानीय समाधान जैसे कि जैविक खेती, मिश्रित फसल, बीज बैंक और कृषि वानिकी मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं और आवासों को पुनर्स्थापित करते हैं। ये कीटनाशकों पर निर्भरता कम करते हैं और प्राकृतिक शत्रुओं को बढ़ावा देते हैं। परागणकों की संख्या में वृद्धि होती है, जिससे फसल उत्पादन भी स्थिर रहता है।
जैव विविधता ह्रास से किसानों को क्या हानि होती है?
जैव विविधता ह्रास से मिट्टी की उर्वरा शक्ति घटती है, फसलों में रोग और कीटों का प्रकोप बढ़ता है, और परागणकों की कमी से उपज में गिरावट आती है। किसानों को अधिक रासायनिक आदानों पर खर्च करना पड़ता है, लेकिन फिर भी उत्पादन घटता है। इससे आर्थिक नुकसान होता है और छोटे किसानों की आजीविका खतरे में पड़ती है।
क्या जैविक खेती भारत में संभव है?
हाँ, सिक्किम ने इसे सफलतापूर्वक लागू किया है। जैविक खेती के लिए प्रारंभिक परिवर्तन में समय और प्रशिक्षण की आवश्यकता है, लेकिन लंबे समय में यह लाभदायक है। कई संगठन किसानों को जैविक विधियों में प्रशिक्षित कर रहे हैं। सरकारी योजनाएँ जैसे परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) इसे प्रोत्साहित करती हैं।
संदर्भ स्रोत: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, FAO, IPBES, सिक्किम सरकार, Centre for Science and Environment, नेशनल ब्यूरो ऑफ़ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज।

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लागत और व्यापार-संबंधी विचार
सीधा उत्तर: जैव विविधता संरक्षण के स्थानीय समाधानों में शुरुआती लागत अधिक आती है, लेकिन लंबे समय में ये कम खर्चीले साबित होते हैं और स्वास्थ्य तथा पर्यावरणीय लाभ देते हैं, जबकि शॉर्ट-टर्म में किसानों को कुछ नुकसान उठाना पड़ सकता है।
औद्योगिक खेती से जैविक खेती में बदलने में पहले 2-3 साल तक उपज में 10-20% तक की गिरावट आ सकती है, क्योंकि मिट्टी को अपना प्राकृतिक संतुलन फिर से बनाने में समय लगता है। इस दौरान रासायनिक खादों और कीटनाशकों की बचत होती है, लेकिन जैविक खादों और बीजों पर अतिरिक्त खर्च भी आता है। एक अध्ययन (ICAR, 2021) के अनुसार, जैविक खेती में उर्वरक की लागत 30-40% तक कम हो जाती है, लेकिन श्रम लागत 10-15% बढ़ सकती है।
⚠️ एक बड़ी व्यापार-व्यवस्था यह है कि जैविक खेती के लिए प्रमाणन और बाजार पहुँच में समय लगता है। किसानों को अपनी उपज को जैविक प्रमाणन के बिना अधिक दाम पर बेचने में मुश्किल होती है। इसलिए, सरकारी सब्सिडी और सहायता योजनाओं का सही उपयोग करना ज़रूरी है, जैसे पीकेवीवाई या परंपरागत कृषि विकास योजना।
Bottom line: जैव विविधता के पक्ष में चुना गया रास्ता कम समय में महंगा दिख सकता है, लेकिन दीर्घकालिक खर्चों (स्वास्थ्य, मिट्टी और पानी) में बड़ी बचत कराता है। कुल मिलाकर, यह आर्थिक रूप से बेहतर विकल्प है, बशर्ते किसानों को सहारा और बाजार मिले।
आम आपत्तियों के उत्तर
सीधा उत्तर: लोग अक्सर कहते हैं कि जैविक खेती से पर्याप्त भोजन नहीं मिल सकता या यह केवल अमीरों के लिए है, लेकिन शोध दिखाते हैं कि विविध-फसल प्रणालियाँ अधिक पौष्टिक और लचीली होती हैं, जबकि रासायनिक खेती की तुलना में लंबे समय में इनकी उपज कम नहीं होती।
आपत्ति 1: "जैविक खेती से भूख नहीं मिटेगी।" इसका उत्तर यह है कि वैश्विक स्तर पर प्रति हेक्टेयर अनाज उत्पादन 1961 में 1.4 टन था, जो 2020 में 4.4 टन हो गया (FAO, 2022)। लेकिन इस वृद्धि का बहुत हिस्सा पशु आहार और जैव ईंधन में जाता है। जब हम विविध खेती को अपनाते हैं, तो उपज भले ही घटे, लेकिन कुल कैलोरी और पोषण सुरक्षा बेहतर होती है।
आपत्ति 2: "सिर्फ अमीर देशों के लिए संभव है।" यह सच नहीं है। भारत में सिक्किम और आंध्र प्रदेश के कई छोटे किसान, जिनकी जोत 2 हेक्टेयर से कम है, जैविक या प्राकृतिक खेती से अच्छा जीवन जी रहे हैं। Rythu Sadhikari Samstha (2021) के अनुसार, आंध्र प्रदेश में प्राकृतिक खेती अपनाने वाले 6 लाख से अधिक किसानों की लागत में कमी आई है और उपज में कई क्षेत्रों में मामूली गिरावट ही देखी गई।
आपत्ति 3: "रासायनिक खेती ज़्यादा ज़रूरी है।" इसका उत्तर है कि ज़रूरी लक्ष्य खाद्य सुरक्षा है, न कि रासायनिक खेती। जब हम पारंपरिक और मिश्रित खेती की ओर लौटते हैं, तो हम आत्मनिर्भरता और पर्यावरण दोनों को बचाते हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में यह अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि मोनोकल्चर असफलताओं का जोखिम बढ़ाता है।
हिंदी-भाषी पाठकों के लिए क्षेत्रीय दृष्टिकोण
सीधा उत्तर: हिंदी भाषी राज्यों – उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और झारखंड – में स्थानीय बीज, मिश्रित फसल और पारंपरिक जल प्रबंधन की समृद्ध परंपराएँ हैं, जो आज भी छोटे स्तर पर जीवित हैं, पर औद्योगिक खेती के दबाव में हैं।
उत्तर प्रदेश में चावल की 2,000 से अधिक स्थानीय किस्में पाई जाती थीं, जिनमें काला भात, जीरा शंकर और सीता शंकर शामिल हैं। इनकी खेती अब लगभग समाप्त हो गई है, सिवाय कुछ जैविक खेतों में। बिहार में मखाना और मकई की पारंपरिक किस्में अपनी जैव विविधता का हिस्सा हैं, लेकिन उच्च उपज वाली किस्मों ने इनको किनारे कर दिया।
मध्य प्रदेश और राजस्थान में बाजरा, ज्वार, मूंग और अरहर जैसी फसलों की खेती एक समय में आम थी, जो पोषण से भरपूर और जलवायु के अनुकूल थीं। अब इनकी जगह गेहूं-धान का चक्र ले रहा है, जो भूजल पर बहुत अधिक दबाव डालता है। पंजाब और हरियाणा में धान की खेती के कारण भूजल स्तर में गिरावट दर्ज की गई है (CGWB, 2022)।
🌱 सकारात्मक पहल भी हैं। बिहार में "मोटे अनाज" (पोषक अनाज) को बढ़ावा देने के लिए कई NGO काम कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के बुन्देलखंड क्षेत्र में सूखा-सहनशील मोटे अनाजों की खेती को फिर से शुरू करने के प्रयास हो रहे हैं। राजस्थान में "श्री अन्न" योजना के तहत बाजरा, ज्वार और रागी को बढ़ावा मिल रहा है। इन राज्यों के किसान यदि पारंपरिक बीजों की ओर लौटें, तो न केवल जैव विविधता बचेगी, बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की उनकी क्षमता भी बढ़ेगी।

व्यावहारिक अगले कदम
सीधा उत्तर: किसान, उपभोक्ता और नीति निर्माता – सभी जैव विविधता बहाली के लिए अपनी-अपनी जगह कदम उठा सकते हैं, जैसे बीजों का आदान-प्रदान, स्थानीय खाद्य क्रय, और नीतिगत बदलावों की माँग।
- किसानों के लिए: धान-गेहूं के बजाय मिश्रित फसलें उगाएँ, प्राकृतिक कीट प्रबंधन (नीम, गोमूत्र) अपनाएँ, खेत की मेड़ों पर पेड़ लगाएँ, और स्थानीय बीज बैंकों से बीजों का संरक्षण करें। उत्तराखंड के "बीज बचाओ आंदोलन" (Beej Bachao Andolan) ने 500 से अधिक चावल और गेहूं की किस्मों को संरक्षित किया है – यह मॉडल दूसरे राज्यों में भी लागू किया जा सकता है।
- उपभोक्ताओं के लिए: स्थानीय मंडियों से जैविक और पारंपरिक अनाज खरीदें, फल-सब्जियों को मौसमी रूप से चुने ताकि बाहरी फसलों पर निर्भरता न बढ़े, और जिन किसानों को पता है कि वे विविध खेती कर रहे हैं, उन्हें उचित मूल्य दें।"
- नीति निर्माताओं के लिए: रासायनिक उर्वरकों पर सब्सिडी धीरे-धीरे हटाकर जैविक खादों व प्राकृतिक खेती पर सब्सिडी बढ़ाएँ, बीज बैंकों को वित्त पोषित करें, और जैव विविधता संरक्षण को कृषि नीति का केंद्र बिंदु बनाएँ।"
सबसे आसान शुरुआत घर में किचन गार्डन से करें और कम से कम एक स्थानीय फसल का बीज संरक्षित करें। यह छोटा कदम बड़ी विरासत को बचाने में मदद करेगा। ज़्यादा जानकारी के लिए आप अपने राज्य के कृषि विभाग ""मृदा स्वास्थ्य कार्ड"" योजना से जुड़ सकते हैं।
तथ्य बनाम मिथक: एक तालिका
सीधा उत्तर: आम धारणाएँ और वैज्ञानिक तथ्य में अंतर स्पष्ट होता है, क्योंकि जैव विविधता पर बिना साक्ष्य के कई मिथक प्रचलित हैं।
| मिथक | तथ्य |
|---|---|
| जैविक खेती से भुखमरी बढ़ेगी | वैश्विक स्तर पर अनाज का उत्पादन पेट भरने से अधिक है; असली समस्या वितरण और पोषण है। विविध फसलें अधिक कैलोरी और पोषण देती हैं (फॉरेन पॉलिसी, 2020)। |
| जैव विविधता का नुकसान सिर्फ वनों में होता है | खेतों की जैव विविधता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है; अनाज, कीट अमीबा और सूक्ष्मजीव खेतों में ही रहते हैं (FAO, 2021)। |
| रासायनिक खेती फसल उत्पादन के लिए आवश्यक है | कई अध्ययन दिखाते हैं कि जैविक खेती में उपज केवल 5-10% कम होती है, लेकिन मिट्टी और पानी की गुणवत्ता बेहतर रहती है (कॉर्नेल विश्वविद्यालय, 2022)। |
| स्थानीय बीज कम उपज देते हैं | पारंपरिक बीज अक्सर प्रतिकूल परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन करते हैं और उनकी पोषण गुणवत्ता उच्च होती है (ICAR, 2021)। |
| पशुधन जैव विविधता के लिए हानिकारक है | अत्यधिक औद्योगिक पशुपालन हानिकारक है, लेकिन गोबर और चारा खेती वाले पशुपालन पोषक चक्रों में मदद करते हैं (IPBES, 2019)। |
Key stat: भारत में 60% से अधिक कृषि भूमि वर्षा पर निर्भर है (IMD, 2022)। इन क्षेत्रों में मोटे अनाज (millets) की खेती को बढ़ावा देना जलवायु परिवर्तन के प्रति फसलों को लचीला बनाता है और जैव विविधता को बचाता है।
इस तालिका को याद रखें जब कोई आपसे कहे कि सिर्फ औद्योगिक खेती ही आधुनिक है। सच्चाई यह है कि जैव विविधता ही भविष्य है, रासायनिक खेती नहीं।
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“जब जैव विविधता का जाल टूटता है, तो किसान रसायनों पर और निर्भर हो जाते हैं।”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- औद्योगिक कृषि जैव विविधता को कैसे प्रभावित करती है?
- औद्योगिक कृषि में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग से लाभकारी कीट, पक्षी और मृदा सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं। मोनोकल्चर खेती से फसलों की आनुवंशिक विविधता घटती है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर होता है और फसलें रोगों के प्रति संवेदनशील बन जाती हैं। इससे पूरा खाद्य जाल प्रभावित होता है।
- हरित क्रांति का भारतीय जैव विविधता पर क्या प्रभाव पड़ा?
- हरित क्रांति ने उच्च उपज वाली गेहूं और चावल की किस्मों को बढ़ावा दिया, जिससे उत्पादन बढ़ा, लेकिन स्थानीय बीजों की कई किस्में विलुप्त हो गईं। एक अनुमान के अनुसार, पारंपरिक चावल की 100,000 से अधिक किस्मों में से अब केवल कुछ हज़ार ही बची हैं। इससे किसानों की आनुवंशिक विविधता और जोखिम सहनशीलता घटी।
- मोनोकल्चर खेती के नुकसान क्या हैं?
- मोनोकल्चर में एक ही फसल बड़े क्षेत्र में उगाई जाती है, जिससे मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी होती है और कीटों का प्रकोप बढ़ता है। जलवायु परिवर्तन और नई बीमारियों के प्रति फसलें अत्यधिक संवेदनशील हो जाती हैं। पंजाब-हरियाणा में धान-गेहूं चक्र से भूजल स्तर में गिरावट आई है। मिश्रित फसल इन जोखिमों को कम करती है।
- बीज बैंक क्या हैं और वे क्यों महत्वपूर्ण हैं?
- बीज बैंक स्थानीय फसल किस्मों के बीजों को संरक्षित करने के केंद्र हैं। वे आनुवंशिक विविधता को सुरक्षित रखते हैं, जो रोगों और सूखे के प्रति सहनशीलता लाती है। किसानों को बीज बचाने, अदला-बदली करने और जलवायु-अनुकूल किस्में चुनने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। ये बैंक भविष्य में नई फसलों के विकास के लिए आनुवंशिक स्रोत के रूप में काम करते हैं।
- भारत में जैविक खेती की मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं?
- जैविक खेती में संक्रमण के दौरान 2-3 साल तक उपज घट सकती है, जिसके लिए वित्तीय सहायता की आवश्यकता होती है। जैविक प्रमाणन की लागत और बाजार तक सीधी पहुँच का अभाव भी बाधा है। इसके अलावा, सब्सिडी व्यवस्था रासायनिक उर्वरकों को सस्ता बनाती है, जिससे निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा नहीं हो पाती। राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामुदायिक सहभागिता से इन बाधाओं को दूर किया जा सकता है।
- जैव विविधता ह्रास से खाद्य सुरक्षा पर क्या असर पड़ता है?
- जैव विविधता ह्रास से परागणकर्ता घटते हैं, जिससे फसल उत्पादन प्रभावित होता है। दुनिया की 80% फसलें परागण पर निर्भर हैं। आनुवंशिक विविधता कम होने से फसलें रोगों और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील हो जाती हैं, जिससे खाद्य उत्पादन अस्थिर होता है और खाद्य असुरक्षा बढ़ती है। स्थानीय किस्में जोखिम बीमा का काम करती हैं।
- मिश्रित फसल और कृषि वानिकी कैसे मदद करते हैं?
- मिश्रित फसल में एक ही खेत में कई फसलें उगाई जाती हैं, जिससे कीटों का प्रकोप कम होता है और मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। कृषि वानिकी में खेत की मेड़ों पर पेड़ लगाए जाते हैं, जो पक्षियों और लाभकारी कीटों के लिए आवास बनाते हैं। ये विधियाँ पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करती हैं और किसानों की बाहरी आदानों पर निर्भरता घटाती हैं।
- क्या जैविक खेती से पर्याप्त उपज मिल सकती है?
- हाँ, एक अध्ययन के अनुसार जैविक खेती से उपज में 20-40% की वृद्धि हो सकती है, बशर्ते संक्रमण के बाद मिट्टी की सेहत सुधर जाए। सिक्किम जैसे राज्यों ने पूर्ण जैविक खेती अपनाकर यह साबित किया है। जैविक खेती से मिट्टी की उर्वरा शक्ति दीर्घकालिक रूप से बढ़ती है और उत्पादन टिकाऊ होता है।
स्रोत
- फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन (FAO) – जैव विविधता और कृषि
- IPBES – ग्लोबल असेसमेंट रिपोर्ट ऑन बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज
- राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA), भारत
- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)
- नेशनल ब्यूरो ऑफ़ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (NBPGR)
- Centre for Science and Environment (CSE), भारत
- केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड एवं समिति (CIB&RC), भारत
- IPCC – क्लाइमेट चेंज एंड लैंड रिपोर्ट
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- एक आवास-संरक्षण संस्था को दान करेंछोटे मासिक दान भी मिलकर बड़ा असर डालते हैं।
- एक परागणकर्ता-अनुकूल क्षेत्र लगाएंखिड़की की चौखट भी काफी है।
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